Tuesday, January 24, 2017

राज - उपदेश

सभा थी दंग, सहमा सा था पुरा सदन
कृश काया थी, उधड़ा सा था पुरा बदन
पीठ झुकाये वह बुढ़ा, पर सीना ताने
आ खड़ा हुआ सदन में, ना कहना माने

बोला अपने कृश कंध उचकाते से
कर अपने दोनों जोड़े, सकुचाते से
हे नृप, आंखें खोलो! देखो इस शस्य धरा को
अमल धवल इस अमित व्योम को, अर्णव को

यह भूमि है राम कृष्ण की
बुद्ध, महावीर और मनु की
गंगा कावेरी जिसको सींचे है
सिन्धू जिसके पग भींचे है

चार ऋतुओं का देश यह प्यारा
सकल धरा पर अलग है न्यारा
हम सब इसकी संतान हैं प्रिय
सब अपने हैं कोई नहीं अप्रिय

सनातन है यह धरती, है धर्म सादा
निज सच्चाई है उच्च, उच्च है मर्यादा
वसुधैव कुटुंबकम का उदघोष सदा
स्वहित, राष्ट्रहित में नहीं बनती बाधा

हे भूप! फिर क्यों जल रहा देश?
मित्र और शत्रु का एक है भेष
जागो जागो!! आंखें खोलो
राष्ट्र-द्रोहीयों के पाप को तौलो

डर है भारत बदल ना जाए
अविरल गंगा पलट ना जाए
भरत की संतान ना कायर हो जाएं
संगीन थामे हाथ ना शायर हो जाएं

राजा का कर्म है आगे चलना
राजा का धर्म है धर्म पर चलना
राष्ट्रहित, स्वहित से रखो हमेशा उच्च
बलिदान किसी का ना हो जाए तुच्छ

Tuesday, November 8, 2016

क्या कहा कि राजा टूट गया?..........

क्या कहा!!!!
क्या कहा कि राजा टूट गया?
क्या सौभाग्य देश का फूट गया?

राजा तो सकल यशस्वी था
लगभग वो एक तपस्वी था
प्रजा का बड़ा दुलारा था
स्वजनों का भी प्यारा था
जिसके पास हो चतुरंगिनी सेना
पौरूष उसका कैसे छूट गया?
क्या कहा कि राजा टूट गया?..........

कोटी कोटी मनुज जिसकी जय बोलें
स्वयम् विश्वनाथ जिसके सहाय हो लें 
जिसकी गर्जना से दिग्गज डोलें
जिसकी ऊर्जा से हम सब बोलें
उसके प्रहरी रहते रहते भी
रावण अयोध्या कैसे लूट गया?
क्या कहा कि राजा टूट गया?..........

राजा को है क्या संताप
कोई याद दिलाये प्रताप
जिसने सेवा का प्रण लिया था
राष्ट्र सम्मान हेतू रण किया था
फिर राष्ट्रद्रोहियों के बदले
क्यों ऊर अपना ही वो कूट गया?
क्या कहा कि राजा टूट गया?..........

नृप जो रिपु के आगे घुटने टेके
सो जाये निश्चिंत करवट लेके
क्या वो चक्रवर्ती कहलायेगा?
या यश वो अपवर्ती हो जायेगा?
द्रोहियों पर तु कोप कर, जिनके
पाप का घड़ा अब फूट गया
क्या कहा कि राजा टूट गया?..........

मैं अकिंचन हाँ मैं अनाम
आह्वान तेरा मैं करूँ क्या
तु महादेव का ध्यान कर
उठा गांडिव, संधान कर
पुनः आज हूँकार कर तू
कि सोमनाथ कोई फिर लूट गया
क्या कहा कि राजा टूट गया?..........

सुखमय भविष्य बतलाया तुमने
विश्वगुरू का स्वप्न दिखलाया तुमने
वंदे मातरम का जयघोष कर के
विजयी भव का उद्घोष कर के
ना कहे कोई कि वो स्वप्न टूट गया
क्या कहा कि राजा टूट गया?..........

Monday, November 7, 2016

हम वीर शिवा के जाये हैं...........

हम वीर शिवा के जाये हैं
हम धीर प्रताप के जाये हैं

अग्रज मेरे यशस्वी दिनकर
कहो कौन है हमसे बढ़कर?
शस्य श्यामला की संतान हैं हम
देवों का वरदान हैं हम
सकल दासता के चंगुल से
यह देश बचा कर लाये हैं
हम वीर शिवा के जाये हैं.............

हम सावरकर हम सुभाष
हम तिलक हम जयप्रकाश
हम भगत सिंह हम आजाद
हम बिस्मिल हम जतिन्द्रनाथ
हर नाम श्वास में रहा निरंतर
हर स्वर ने इनको गाये हैं
हम वीर शिवा के जाये हैं.............

धमनियों में हमारे दावानल है
शोणित नहीं, यह दिव्यजल है
कायरता नहीं पराक्रम है
हुतात्माओं का ये क्रम है
इस सुखदां वरदां की धरती के
अन्न तो तुमने भी खाये हैं
हम वीर शिवा के जाये हैं.............

कर्तव्य तुम्हें भी याद रहे
स्वस्वार्थ देश के बाद रहे
धर्म राष्ट्र की ओर चलो
बंधनों को तुम तोड़ चलो
मेरा तेरा, तेरा मेरा
ये विघटन के साये हैं
हम वीर शिवा के जाये हैं.............

माँ को गौरव दिलाने को
देवों को सोम पिलाने को
अपना सर्वस्व अब हम होम करें
निज भय का अब हम लोम करें
त्याग परंपरा की हमें शपथ
भामशाह ने दिलवाये हैं
हम वीर शिवा के जाये हैं
हम धीर प्रताप के जाये हैं।।